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| एहसास-ए-वक्त |
आज साम सूरज को कहीं दूर छिपते देख ।
मन मे खयाल आया । कि वो पल और उस पल का अहसास कैसा रहा होगा अपनी ज़िन्दगी से अपने आप से क्या क्या सिकायतें रही होंगी। जब इंसान अपने हालातों से बाद मै ? अपने आप से पहले हार जाता है । सायाद दिल के अनकहे अनबुझे अहसास को लिए आंसू नंगे पांव ख्वाहिश की दोपहरी मै भागते दौड़ते आंखों तलक आ जाते है । और आंखें उनकी सिकायतों की नमी में अपने आपको हमेशा के लिए डुबो लेती है । और ज़िन्दगी को जाने बग़ैर समझे बगैर ही । अपनी हस्ती को एैसे मिटा देता है जैसे कभी था ही नहीं । ज़िन्दगी की किताब को बिना पढ़े ही जला देता है हमेशा के लिए ।
जिसके आज के पन्ने में अगर दुःख थे । तो कहीं कल के पन्ने में सुख़ भी होंगे । जिसके आज के पन्ने में धूप थी । तो सायद कल के पन्ने में छावं भी होगी । जिसके आज के पन्ने में अंधेरा था तो आने वाले कल के पन्ने में एक खिलखिलाती सुनहरी सुबह भी होगी सायद.......
एहसास-ए-वक्त

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