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| नयी उम्मीदें (Part-1) |
विकाश पोरवाल और उसका परिवार एक छोटे से कस्वे साहिल मैं रहा करता था ,विकाश पोरवाल के घर मैं उसके माँ बाप और उसकी दो बड़ी बहनें थीं ,और वो सब मैं छोटा था ,भले उसका घर छोटा सा था लेकिन विकाश पोरवाल के सपने बड़े बड़े थे ,क्यों की सपनों को बसने के लिए किसी महल या दौलत की जरूरत नहीं होती ,न वो अमीरी जानते है, और नाहीं उन्हें ग़रीबी की परवाह है ,सपने तो एहसास व जज्बात से बनते है भावनाओं से बनते है ,खैर खुशियां तो हर बक्त झूमतीं फिरतीं उसके इर्ध गिर्द , विकाश पोरवाल की बहने उसको कभी चिड़ातीं कभी सतातीं और कभीं देर रात तक कहानियां सुनतीं ,क्यों विकाश पोरवाल घर में सबसे छोटा जो था ,वो अपनी नन्ही नन्हीं बातों मैं माँ से अपनीं बहनों की शिकायत करता ,तो कभी उसकी माँ भी उसको चिढ़ाते हुए बोलती की तूभी तो सारे दिन उनकों अपने पीछे भगाता फिरता है ,अब खुद ही सुलझ जाकर उनसे ,ऐसी ही नादानियों व शरारतों से भरा रहता उसका छोटा सा घर ,लेकिन अचानक इन पलती बढ़ती खुशियों को बक्त की नजर लग गयी ,उसकी माँ का साया बिछड़ गया था उससे ,जैसे सुबह सुबह जब खिड़कियों को खोला तो धुंद के सिवा बहार कुछ ना दिखाई दिया हो ,जैसे बे बक्त बारिस हो उठी हो ,जैसे अचानक ओले बरस पड़े हों ,सायद वो पल वो लम्हा कुछ ऐसा ही था विकाश पोरवाल के परिवार के लिए ,और वो बक्त दे गया था एक ज़िन्दगी के बदले मुट्ठी भर यादें .
नयी उम्मीदें

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