यूं तो तुमको जाए एक अरसा हो गया है लेकिन आज तुम्हारी अलमारी को खोला
हमारी किसी पुरानी तस्वीर के टुकड़े ओर एक मैला गंदा सा तुम्हारे अनकहे अनसुने
अनबुझे जज्बात की स्याही से लथपथ खत मिला और ये आखिरी लाइन लिखते वक्त शायद तुम्हारी
आंखें झलक गई होंगी इसी लिए ये खत अभी भी कुछ सीला सा है अभी भी तुम्हारे नर्म आंसुओं
के दाग़ मौजूद है और मौजूद है वो तुम्हारे होठों की लिपस्टिक जो तुमने आखरी
बार इस खत को सहेज कर रखते वक्त अपने होठों से लगाया होगा तुमसे बहुत कुछ कहना चाहता था
तुमसे माफी भी माँगना चाहता था तुमसे प्यार भी करना चाहता था
किसी ढलती शाम समुंदर के किनारे बेठ कर तुम्हारे चेहरे को निहारते
सिर्फ तुमको सुनना चाहता था लेकिन मैं और मेरे जज़्बात कभी
इन पन्नों से निकल कर तुम तक कभी पहुंच ही नहीं
असल मैं अपनों से कुछ कह पाना कहाँ आसान होता है

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