Wednesday, 9 June 2021

यूं तो तुमको जाए एक अरसा हो गया है

 

यूँ तो तुमको गए एक अरसा हो गया है


यूं तो तुमको जाए एक अरसा हो गया है लेकिन आज तुम्हारी अलमारी को खोला

हमारी किसी पुरानी तस्वीर के टुकड़े ओर एक मैला गंदा सा तुम्हारे अनकहे अनसुने

अनबुझे जज्बात की स्याही से लथपथ खत मिला और ये आखिरी लाइन लिखते वक्त शायद तुम्हारी

आंखें झलक गई होंगी इसी लिए ये खत अभी भी कुछ सीला सा है अभी भी तुम्हारे नर्म आंसुओं

के दाग़ मौजूद है और मौजूद है वो तुम्हारे होठों की लिपस्टिक जो तुमने आखरी

बार इस खत को सहेज कर रखते वक्त अपने होठों से लगाया होगा तुमसे बहुत कुछ कहना चाहता था

तुमसे माफी भी माँगना चाहता था तुमसे प्यार भी करना चाहता था

किसी ढलती शाम समुंदर के किनारे बेठ कर तुम्हारे चेहरे को निहारते

सिर्फ तुमको सुनना चाहता था लेकिन मैं और मेरे जज़्बात कभी

इन पन्नों से निकल कर तुम तक कभी पहुंच ही नहीं

असल मैं अपनों से कुछ कह पाना कहाँ आसान होता है




Wednesday, 26 May 2021

Corona pandemic

 



आज ये मेरे शहर को हुआ क्या
ये डर कैसा ये खौफ कैसा
ये गलियों की खूबसूरती किसने लूटली
ये असमा से चिड़ियों का चेहचाना किसने छीन लिया
आज वो नुक्कड़ भी सुना क्यों है जहां अक्सर
कुछ यार दोस्त चाय या सिगरेट भूंकने आ जाया करते थे
आज ये बारिश की बूंदों में सभी पेड़ इतने उदाश क्यों
आज ये मेरे देश की ज़मीन भीग भी रही है लेकिन इसमें
कोई नमी क्यों नहीं इसकी तपिश कम क्यों नहीं ।

Sunday, 10 May 2020

This mother's Day




तेरी ही तो आंखों से पहली बार दुनियां को देखा मैंने 

तेरे ही तो पाओं से चलना सीखा मैंने 

मेरे मुंह मैं ज़ुबान कहां थी भाषा की पहचान कहां थी

तेरे ही तो चेहरे को देख कर पढ़ना सीखा  मैंने 

तेरी ही तो आंखों से पहली बार दुनियां को देखा मैंने 

तेरी गोदी के जैसा खूबसूरत घर कहां है तेरी बाहों के 

जैसा शहर कहां है तेरी ही तो उंगली पकड़ कर चलना सीखा मैंने

तेरी ही तो आंखों से पहली बार दुनियां को देखा मैंने

जाने कितनी बार साड़ी के छोर से मेरी आंख को सेका है तूने 

मिट्टी में खेलते वक्त पैर में चुभे कांटे को निकाला है तूने

कभी लाला कभी बेटा कभी राजकुंवर कह कर पुकारा है तूने 

तेरी ही तो आंखों से पहली बार दुनियां को देखा मैंने


तेरी ही तो आंखों से पहली बार दुनियां को देखा मैंने



Sunday, 25 August 2019

नयी उम्मीदें (आखिरी भाग)

नयी उम्मीदें (आखिरी भाग)


. शुबह हुई नितिन ने सबसे पहले माँ से बात करना उचित समझा,उनको समझाया कि चलो मानलो  अगर मैंने आपकी पसन्द की लड़की से शादी कर भी ली तो ज्यादा से ज्यादा क्या होगा सिर्फ दो परिवार रिस्तेदारी के नाते मैं बंध कर रह जायेंगे दिल नहीं , मैं उसको खुश रख पाउँगा मैं खुद कभी रह पाउँगा,और इस ज़माने की लोगों की क्या बात करते हो माँ ,
सदियों से रिश्तों मैं दखल देना खामी निकालना तो इस ज़माने की फ़ितरत रही
है शौक रहा है,स्वभाव रहा है ,लोग आज को याद रखते है, कल को नहीं ,लोग दो चार दिन बातें करेंगे और सब भूल जाएंगे , आखिर कार नितिन के घर वाले इस रिश्ते के लिए मान ही गए ,और मानते भी क्यों क्यों कि आखिर कार हर माँ बाप ताउम्र सिर्फ यही तो चाहते हैं कि उनके बच्चे जहाँ भी रहें जैसे भी रहें खुश रहें , मेहफूज रहें ,
सुख़ सम्रद्धि से रहें, वो जीते ही उनके लिए हैं ,खैर इधर विकाश पोरवाल  के घर वालों को ये
खुशखबरी मिली तो सभी के चेहरे पर एक हल्की सी मुश्कुराहट आगई ,फिर से उसका घर चेह्कती ,महकती ,खिलखिलाती खुशियों से भर गया,विकाश पोरवाल ने अपनी दीदी की शादी बड़ी धूम-धाम से की ,लेकिन कुछ खुशियों के कुछ नन्हे पलों ने उसकी उंगली थामी ही थी ,
लेकिन दीदी की शादी के कुछ महीनों बाद ही उसके सर से उसके पिता का साया बिछड़ गया,
जैसे किसी सुनहरी सुबह को वो चख भी नहीं पाया उससे पहले ही किसी काली घटा ने फिर से बसेरा कर लिया , परिवार वालों ने भी अपना हाथ पीछे खींच  लिया लेकिन बक्त से
हार मानना तो उसने कभी सीखा ही नहीं था ,माँ पापा के गुजर जाने की उदासी उसको कहीं झकझोर ना दे कहीं सिमटा ना दे उसको कहीं कमज़ोर ना करदे, इस लिए उसने अपने आपको पढ़ाई मैं पूरी तरह से झोंक दिया वो चलता ही रहा , ना धूप देखी छावं , दिन देखा रात ,
आखिर इम्तिहान भी उसका इम्तिहान लेते लेते थक गए , ये उजाले कहाँ डरते हैं अंधेरों से बुझते भी हैं जलते भी हैं फिर रौशन करते हैं कोई दिल कोई कोहनां कोई जहाँ , आज एक अर्शा होने को है विकाश पोवाल इंडियन रेलवे मैं अफसर है और जब भी माँ पापा को करना होता है तो छत पर जाता है और टिमटिमाते तारों को देख कर हलके से मुश्कुरा लेता है. दोस्तों रस्ते कितने भी क्यों लम्बे हों सफर भी ज़िद्दी होता है एक एक मंज़िल को हांसिल कर ही लेता है



नयी उम्मीदें (आखिरी भाग)