Sunday, 27 May 2018

वक्त को अल्फ़ाज़ बनाकर ज़िन्दगी को लिखने की कोशिस करता हूं जैसे जमाने के शोर सराबे में खामोशी को तलाशा करता हूं

वक्त को अल्फ़ाज़ बनाकर  ज़िन्दगी को लिखने की कोशिस करता हूं  जैसे जमाने के शोर सराबे में  खामोशी को तलाशा करता हूं
वक्त को अल्फ़ाज़ बनाकर

वक्त को अल्फ़ाज़ बनाकर
ज़िन्दगी को लिखने की कोशिस करता हूं
जैसे जमाने के शोर सराबे में
खामोशी को तलाशा करता हूं

जानता हूं मेरी ज़िन्दगी की खाली डायरी में
छुपे है बस दिन और रात
फिर भी वीरान सी उस रात में
सपनों को ढूंढने की नाकाम कोशिस करता हूं
वक्त को अल्फ़ाज़ बनाकर
ज़िन्दगी को लिखने की कोशिस करता हूं

भर ही जायेंगे सायाद एक दिन मेरे जीवन के ये पन्ने
कुछ बातें अनकही तो एक किस्सा अनसुना रह जायेगा
फिर गुजरेगा कहीं किसी गली से वो रद्दी वाला
और चुरण का लाल्सा देकर मेरी डायरी को लेजाएगा


वक्त को अल्फ़ाज़ बनाकर



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