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| नयी उम्मीदें (Part-2) |
जहाँ ना शाम ढलती है न कभी सुबह होती है, जहाँ न किसी से मोह है न लालच,माँ के गुजर जाने के बाद विकाश पोरवाल और उसका परिवार तो जैसे अकेला होगया था ,और उसके पापा भी अंदर से कहीं न कहीं टूट गए थे,घर मैं आये इस अजब से सन्नाटे के चलते ,उसके पापा ने दवाओं की दुकान को भी बंद कर दिया ,
और शराब को गले से लगा लिया, देर रात तक घर बापस आने लगे ,उनका ना आने का बक्त था,ना जाने का ठिकाना,अजब हाल बना लिया था,और यूँ ही कई सालें बीत गयीं ,अब विकाश पोरवाल भी समझदार होगया था ,अपने पापा को इस हालत मैं तो वो बचपन से देखता आरहा था,लेकिन आज उसने पूंछ ही लिया ,पापा आपने
ये अपना क्या हाल बना लिया है,आपको सायद नहीं मालूम होगा लेकिन आपकी हमें फिक्र होती है,दुःख होता है ,माँ के गुजर जाने का दुःख हमें भी उतना ही है जितना की आपको,हम भी उतना ही अकेले है जितना
की आप,लेकिन अब तो वो यादें-वो लम्हे सोच मैं भी धुंदले से दिखाई देते हैं,और बक्त ने भी वो कहीं मिटा दिए होंगे,लेकिन मैं कुछ नहीं मिटा पाया,एक ख़ामोशी भरी चुप्पी के बाद उसके पापा बोले,बेटा तेरी माँ के मरने के बाद में कभी जिया ही नहीं,और कैसे जियूँ ,जबकि वो मुझमें ज़िंदा ही नहीं है,रातों मैं कैसे सोऊँ जब वो मुझमें सोती ही नहीं है,इस दुनिया से कैसे बात करूं जब वो मुझमें बोलती ही नहीं है,कैसे अपने आपको सम्भालूँ जब वो मुझको थामती ही नहीं है,विकाश पोरवाल की आंखें नम हो आयीं थीं,वो कुछ बोला नहीं बस अपने पापा को कसके सीने से लगा लिया,उस दिन उनके सिकबे गिले, जो कभी बक्त से ज़िन्दगी से रहे थे वो सब आँखों के कोहने से होकर कहीं दिल को हल्का कर गए थे,
नयी उम्मीदें (Part-2)
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